वाह वोही सुहानी तारो भरी रात पुरे चाँद के खिलने के साथ
वोही चाँद की मदम रोशनी के साथ पुरे चाँद के खिलने के साथ
शांत और खिली हुई रोशनी में वातावरण में अजीब सी दस्तक है
सहसा ही मन में अगिनित ख्याल विचरण करने लगते है
नहीं लगती किसी के पदचिन्हों की महक इस सुने छत पर
क्यों बिखरी है खुशबू चारो और क्या आने को है वो पायल की झुनकार
क्यों याद करता है मन बार बार उसको जो न बन सकी कभी इस दिल के पास
क्यों नहीं मिटा देता मन उन बिसरी हुई सुंदर यादो को ,कि न बन सकी वो सखी इस मन कि
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