Thursday, October 27, 2011

man

वाह वोही  सुहानी तारो भरी  रात पुरे चाँद के खिलने के साथ
वोही चाँद की मदम रोशनी के साथ पुरे चाँद के खिलने के साथ

शांत और खिली हुई रोशनी में वातावरण में अजीब सी दस्तक है
सहसा ही मन में अगिनित ख्याल विचरण करने लगते है

नहीं लगती किसी के पदचिन्हों की महक इस सुने छत पर
क्यों बिखरी है खुशबू चारो और क्या आने को है वो पायल की झुनकार

क्यों याद करता है मन बार बार उसको जो न बन सकी कभी इस दिल के पास
क्यों नहीं मिटा देता मन उन बिसरी हुई सुंदर यादो को ,कि न बन सकी वो सखी इस मन कि

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