Wednesday, July 25, 2012

wo shaam

काश ऐसा  होता कि वो दिख जाती इस बरसात में
इन खुबसूरत लम्हों का अपना अलग ही लुफ्त होता

है वोही वक़्त उसके इधर गुजरने का रोज़ की तरह
फिर कहाँ खो गई उसके पायल की मधुर आवाज़

शायद कुदरत ने देर करदी इन बूंदों को इस धरती पर
शायद वो निकल गई अनछुई ,कुदरत की इन बूंदों से

नहीं भूल पाहुंगा में कभी भी कुदरत की उस शाम को
वो भीगा हुआ बदन ,भीगी हुई बालो की लटे और पायल की आवाज़

Monday, July 9, 2012

आज फिर वोही शाम है जैसी बरसो पहले थी और वोही मंज़र है
वो गीले कपढ़ों में लिपटी हुई सिमटी हुई उसी कोने में धधक रही थी

सुनसान सढ़क बिल्कूल खामोश थी केवल बारिश की आवाज़ से
उसकी भुझी भुझी आँखे निहार रही थी इधर उधर किसी के इंतज़ार में

उसका सुंदर चेहरा उसकी जुल्फे और पानी की बूंदों के साथ और भी सुंदर हो गया था
सहसा मन में ख्याल आया कि क्यों नहीं में अपनी कार में उसे ऑफर करू घर छोरने की

पर मेरी सोच कुछ ही क्ख्यरों में उरंछु हो गई जब कोही कार आकर वहां रुकी
और पल भर में वो उसमे बेथ कर उरंछु हो गई और मेरी साड़ी उमीदो पर पानी फिर गया