काश ऐसा होता कि वो दिख जाती इस बरसात में
इन खुबसूरत लम्हों का अपना अलग ही लुफ्त होता
है वोही वक़्त उसके इधर गुजरने का रोज़ की तरह
फिर कहाँ खो गई उसके पायल की मधुर आवाज़
शायद कुदरत ने देर करदी इन बूंदों को इस धरती पर
शायद वो निकल गई अनछुई ,कुदरत की इन बूंदों से
नहीं भूल पाहुंगा में कभी भी कुदरत की उस शाम को
वो भीगा हुआ बदन ,भीगी हुई बालो की लटे और पायल की आवाज़
इन खुबसूरत लम्हों का अपना अलग ही लुफ्त होता
है वोही वक़्त उसके इधर गुजरने का रोज़ की तरह
फिर कहाँ खो गई उसके पायल की मधुर आवाज़
शायद कुदरत ने देर करदी इन बूंदों को इस धरती पर
शायद वो निकल गई अनछुई ,कुदरत की इन बूंदों से
नहीं भूल पाहुंगा में कभी भी कुदरत की उस शाम को
वो भीगा हुआ बदन ,भीगी हुई बालो की लटे और पायल की आवाज़