Monday, July 9, 2012

आज फिर वोही शाम है जैसी बरसो पहले थी और वोही मंज़र है
वो गीले कपढ़ों में लिपटी हुई सिमटी हुई उसी कोने में धधक रही थी

सुनसान सढ़क बिल्कूल खामोश थी केवल बारिश की आवाज़ से
उसकी भुझी भुझी आँखे निहार रही थी इधर उधर किसी के इंतज़ार में

उसका सुंदर चेहरा उसकी जुल्फे और पानी की बूंदों के साथ और भी सुंदर हो गया था
सहसा मन में ख्याल आया कि क्यों नहीं में अपनी कार में उसे ऑफर करू घर छोरने की

पर मेरी सोच कुछ ही क्ख्यरों में उरंछु हो गई जब कोही कार आकर वहां रुकी
और पल भर में वो उसमे बेथ कर उरंछु हो गई और मेरी साड़ी उमीदो पर पानी फिर गया

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