आज फिर वोही शाम है जैसी बरसो पहले थी और वोही मंज़र है
वो गीले कपढ़ों में लिपटी हुई सिमटी हुई उसी कोने में धधक रही थी
सुनसान सढ़क बिल्कूल खामोश थी केवल बारिश की आवाज़ से
उसकी भुझी भुझी आँखे निहार रही थी इधर उधर किसी के इंतज़ार में
उसका सुंदर चेहरा उसकी जुल्फे और पानी की बूंदों के साथ और भी सुंदर हो गया था
सहसा मन में ख्याल आया कि क्यों नहीं में अपनी कार में उसे ऑफर करू घर छोरने की
पर मेरी सोच कुछ ही क्ख्यरों में उरंछु हो गई जब कोही कार आकर वहां रुकी
और पल भर में वो उसमे बेथ कर उरंछु हो गई और मेरी साड़ी उमीदो पर पानी फिर गया
वो गीले कपढ़ों में लिपटी हुई सिमटी हुई उसी कोने में धधक रही थी
सुनसान सढ़क बिल्कूल खामोश थी केवल बारिश की आवाज़ से
उसकी भुझी भुझी आँखे निहार रही थी इधर उधर किसी के इंतज़ार में
उसका सुंदर चेहरा उसकी जुल्फे और पानी की बूंदों के साथ और भी सुंदर हो गया था
सहसा मन में ख्याल आया कि क्यों नहीं में अपनी कार में उसे ऑफर करू घर छोरने की
पर मेरी सोच कुछ ही क्ख्यरों में उरंछु हो गई जब कोही कार आकर वहां रुकी
और पल भर में वो उसमे बेथ कर उरंछु हो गई और मेरी साड़ी उमीदो पर पानी फिर गया
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