रात थी तन्हाई थी और चाँद की गवाई थी
और उसके थरथराते होठ कुछ कहने को व्याकुल थे
पर मेरी निगाहे उसकी झील भरी आँखों में कुछ ढूंड रही थी
शायद बिना होंठ खोले दिल की आवाज़ में कुछ बयां कर रही थी
आकाश में चाँद अपनी राह पर धीरे धीरे खिसक रहा था
पर हमें न कुछ पता की क्या हो रहा है पल पल में
अजीब सा मंजर था उस रात के ख़ामोशी में प्यार का
की न चाहता था शायद वक्त भी कुछ अलग होने को
की चाँद दे रहा था गवाई मुस्करा कर इन खुबसूरत पलो को
और उसके थरथराते होठ कुछ कहने को व्याकुल थे
पर मेरी निगाहे उसकी झील भरी आँखों में कुछ ढूंड रही थी
शायद बिना होंठ खोले दिल की आवाज़ में कुछ बयां कर रही थी
आकाश में चाँद अपनी राह पर धीरे धीरे खिसक रहा था
पर हमें न कुछ पता की क्या हो रहा है पल पल में
अजीब सा मंजर था उस रात के ख़ामोशी में प्यार का
की न चाहता था शायद वक्त भी कुछ अलग होने को
की चाँद दे रहा था गवाई मुस्करा कर इन खुबसूरत पलो को
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